'रोज बस्ते हैं कई शहर नए...' पढ़ें कैफी आजमी के शानदार शेर.

कोई कहता था समुंदर हूं मैं, और मिरी जेब में कतरा भी नहीं.

समुंदर हूं मैं

रोज बढ़ता हूं जहां से आगे, फिर वहीं लौट के आ जाता हूं.

रोज बढ़ता

रोज बस्ते हैं कई शहर नए, रोज धरती में समा जाते हैं.

रोज बस्ते हैं

की है कोई हसीन खता हर खता के साथ, थोड़ा सा प्यार भी मुझे दे दो सजा के साथ.

हसीन खता

इतना तो जिंदगी में किसी के खलल पड़े, हंसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े.

खलल पड़े

 गुर्बत की ठंडी छांव में याद आई उस की धूप, कद्र-ए-वतन हुई हमें तर्क-ए-वतन के बाद.

तर्क-ए-वतन