'अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है...' पढ़ें परवीन शाकिर के बेहतरीन शेर.

अब तो इस राह से वो शख्स गुजरता भी नहीं, अब किस उम्मीद पे दरवाजे से झांके कोई.

शख्स गुजरता

बात वो आधी रात की रात वो पूरे चांद की, चांद भी ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी.

पूरे चांद

यूं बिछड़ना भी बहुत आसां न था उस से मगर, जाते जाते उस का वो मुड़ कर दोबारा देखना.

यूं बिछड़ना

अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है, जाग उठती हैं अजब ख्वाहिशें अंगड़ाई की.

अजब ख्वाहिशें

बस ये हुआ कि उस ने तकल्लुफ से बात की, और हम ने रोते रोते दुपट्टे भिगो लिए.

तकल्लुफ से

मैं फूल चुनती रही और मुझे खबर न हुई, वो शख्स आ के मिरे शहर से चला भी गया.

मैं फूल चुनती