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Live-in Relationship पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने की टिप्पणी, कहा- भारतीय संस्कृति के लिए एक कलंक

by Rashmi Rani
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Live in Relationship: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर बड़ी टिप्पणी कर दी है. कोर्ट ने कहा कि भारतीय संस्कृति के लिए यह एक कलंक है.

08 May, 2024

Live in Relationship: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर बड़ी टिप्पणी कर दी है. लिव इन रिलेशनशिप से जन्म लिए बच्चे की कस्टडी की मांग को लेकर पेश की गई अपील में बड़ा फैसला कोर्ट ने सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप एक ‘आयातित दर्शन’ है. सामज के कुछ लोग ऐसे हैं जो लिव इन रिलेशनशिप का पालन करते हैं, जो कि भारतीय संस्कृति के लिए एक कलंक है. लिव-इन रिलेशनशिप भारतीय सिद्धांतों की अपेक्षाओं के विपरीत है. न्यायमूर्ति गौतम भादुड़ी और न्यायमूर्ति संजय एस अग्रवाल की खंडपीठ ने 36 वर्षीय महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे की कस्टडी की मांग करने वाले एक व्यक्ति की अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है.

भारतीय संस्कृति में एक कलंक के रूप में है

एचसी ने कहा कि समाज के कुछ संप्रदायों में अपनाया जाने वाला लिव-इन रिलेशनशिप अभी भी भारतीय संस्कृति में एक कलंक के रूप में जारी है. दंतेवाड़ा जिले के अब्दुल हमीद सिद्दीकी ने अपनी याचिका में कहा कि वह एक अलग धर्म की महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में था और उसने एक बच्चे को जन्म दिया.उन्होंने कहा कि पिछले साल दिसंबर में दंतेवाड़ा की एक पारिवारिक अदालत ने बच्चे की कस्टडी के लिए उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया.

3 साल तक महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में था

एचसी के आदेश के अनुसार सिद्दीकी ने अपनी याचिका में कहा कि वह 2021 में धर्म परिवर्तन के बिना उससे शादी करने से पहले तीन साल तक महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में था. आदेश में कहा गया कि सिद्दीकी की याचिका के अनुसार 31 अगस्त, 2021 को उनके रिश्ते से एक बच्चे का जन्म हुआ. 10 अगस्त, 2023 को उन्होंने मां और बच्चे को लापता पाया. जिसके लिए उन्होंने याचिका दायर की जिसमें मांग की गई कि महिला को एचसी के समक्ष पेश किया जाए.

महिला उसकी दूसरी पत्नी थी

महिला ने हाई कोर्ट को बताया था कि वह अपनी इच्छा से अपने माता-पिता के साथ रह रही है. बाद में दंतेवाड़ा परिवार अदालत द्वारा बच्चे की कस्टडी नहीं दिए जाने पर सिद्दीकी ने फिर से उच्च न्यायालय का रुख किया. एचसी के आदेश के अनुसार महिला उसकी दूसरी पत्नी थी, जबकि सिद्दीकी की पहली पत्नी से तीन बच्चे थे. एचसी में सिद्दीकी के वकील ने कहा कि दोनों ने विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत शादी की थी, क्योंकि यह एक अंतरधार्मिक मिलन था. वकील ने दावा किया कि मुस्लिम कानून के तहत सिद्दीकी को दूसरी शादी करने की अनुमति दी गई थी. दूसरी तरफ महीला ने दावा किया कि सिद्दीकी को इस दूसरी शादी की अनुमति नहीं थी, क्योंकि उन्होंने धर्म-परिवर्तन नहीं किया था तो यह शादी ही वैध नहीं है. ऐसे रिश्ते से पैदा हुए बच्चे के लिए कानूनी अभिभावक होने का दावा नहीं कर सकता है.

लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं को समझना जरूरी

सिद्दीकी की याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि वह फैमिली कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के इच्छुक नहीं है. एचसी ने कहा कि व्यक्तिगत कानून के प्रावधानों को किसी भी अदालत के समक्ष तब तक लागू नहीं किया जा सकता जब तक कि इसे प्रथा के रूप में पेश नहीं किया जाता है और साबित नहीं किया जाता है. कोर्ट ने कहा कि ऐसे रिश्तों में महिलाओं को समझना और उनकी रक्षा करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे अक्सर लिव-इन रिश्तों के साथी द्वारा शिकायतकर्ता और हिंसा की शिकार होती हैं. विवाहित व्यक्ति के लिए लिव-इन रिलेशनशिप से बाहर निकलना बहुत आसान है और ऐसे मामले में अदालतें ऐसे संकटपूर्ण लिव-इन रिलेशनशिप से बचे लोगों और ऐसे रिश्ते से पैदा हुए बच्चों की कमजोर स्थिति पर अपनी आंखें बंद नहीं कर सकती हैं.

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